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झारखंड में नियोजन नीति से कई भाषाओं को हटाने को लेकर सियासत तेज, विपक्ष करेगा आंदोलन, पढ़िये पूरी खबर

रांची: झारखंड में सरकारी नियुक्तियों के लिए चयनित एक दर्जन भाषाओं में से द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त कई भाषाओं को हटा दिए जाने को लेकर सियासत तेज हो गई है। झामुमो जहां इसे ऐतिहासिक फैसला बता रही है, वहीं विपक्षी दल भाजपा और आजसू ने इसके विरोध में आंदोलन की चेतावनी दी है। सत्ताधारी दलों में भी सरकार के इस कदम को लेकर असमंजस की स्थिति है। कांग्रेस विधायक दीपि‍का पांडेय ने अंगिका की अनदेखी पर सवाल खड़े किए हैं, तो मंत्री मिथि‍लेश ठाकुर ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मगही, भोजपुरी और अंगिका आदि भाषाओं का भी विकल्प छात्रों के लिए खुला रखने का आग्रह किया है।

रांची से वरिष्ठ भाजपा विधायक सीपी सिंह ने फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इस निर्णय से एक बड़ी आबादी की अनदेखी हुई है। जिन 12 भाषाओं का चयन किया गया है, उनमें से अधिसंख्य भाषाओं से गढ़वा-पलामू के लोग अनजान हैं। ऐसे में सरकार का फैसला गलत है। वहीं, झामुमो और प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि पूर्व की नियोजन नीति में खामी थी। आदिवासी, मूलवासी, दलितों और पिछड़ों के लिए यह हितकारी कदम है। गौरतलब है कि गुरुवार को राज्य कैबिनेट में नियोजन नीति लाई गई है। इसमें यह भी फैसला लिया गया है कि झारखंड की तृतीय और चतुर्थ वर्गीय नौकरियां अब उन्हीं लोगों को मिलेंगी, जो झारखंड से मैट्रिक और इंटर पास होंगे। भाषा संबंधी भी फैसला लिया गया है। प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक कुमार दूबे, लाल किशोरनाथ शाहदेव और डाॅ. राजेश गुप्ता छोटू ने कहा कि 20 वर्ष में पहली बार आदिवासियों-मूलवासियों के हितों को ध्यान रखकर गठबंधन सरकार ने युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाया गया है।

‘झारखंड में जन्मे, पले और बढ़े लोगों का तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के सरकारी पदों पर पहला हक है। जिनकी नाभि इस धरती में गड़ी है, उन्हीं को नौकरी मिलेगी। सरकार का फैसला ऐतिहासिक है।

‘ -सुप्रियो भट्टाचार्य, महासचिव, झामुमो।

 

‘राज्य सरकार ने पूर्व की नियमावली को परिवर्तित करते हुए मुख्य परीक्षा से हिंदी के विकल्प को समाप्त कर दिया है। यह न सिर्फ राजभाषा का अपमान है, बल्कि इसका सीधा असर लाखों छात्रों पर पड़ेगा।

‘ -प्रतुल शाहदेव, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा।

 

कांग्रेस प्रवक्ताओं ने कहा कि भाजपा को यह मालूम होना चाहिए कि परीक्षा का माध्यम हिंदी में है। झारखंड राज्य कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) द्वारा आयोजित प्रतियोगिता परीक्षाओं में हिंदी और अंग्रेजी विषय में सिर्फ क्वालीफाइंग की अनिवार्यता का निर्धारण किया गया है, जबकि अभ्यर्थी परीक्षा हिंदी भाषा में ही दे सकेंगे। जबकि क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई करने वाले लोग अपने विषय को चुन सकते हैं। इसमें कोई रोक नहीं है। अभ्यर्थी चाहें तो हिंदी को ही मुख्य विषय में चुन सकते हैं।

मंत्री ने सीएम को सौंपा मांग पत्र

झामुमो के वरिष्ठ नेता सह मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने तर्क दिया कि बिहार की एक बड़ी आबादी वर्षों से झारखंड में निवास कर रही है और वे यहां के मूल निवासी हैं। वह भी मगही, अंगिका एवं भोजपुरी आदि भाषा का उपयोग करते हैं। यदि इन्हें क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल नहीं किया गया, तो ऐसे छात्र-छात्राओं की बड़ी संख्या प्रतियोगिता परीक्षा में शामिल होने से वंचित हो जाएगी। ठाकुर ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के आवास पर मुलाकात कर उन्हें इस संदर्भ में मांग पत्र भी सौंपा।

 

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Author: nirbhiknazar

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