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2012 से बदल गया उत्तराखंड मे राजनीति का ट्रेंड, पांच से दो दलों तक सिमट गई उत्तराखंड की राजनीति

देहरादून: क्षेत्रीय आकांक्षाओं को पूरा करने के सपनों के साथ बने उत्तराखंड राज्य की राजनीति अब दो राष्ट्रीय दलों तक सीमित होकर रह गई है। राज्य की प्रथम विधानसभा में जहां पांच दलों का प्रतिनिधित्व था, वहां मौजूदा विधानसभा का प्रतिनिधित्व दो दलों तक सिमट कर रह गया है। उत्तराखंड की पहली विधानसभा के लिए 2002 में चुनाव हुआ था। इस चुनाव में छह राष्ट्रीय दल, एक प्रदेश स्तरीय दल, आठ अन्य राज्यों में मान्यता प्राप्त प्रदेश स्तरीय ओर 13 अपंजीकृत दलों ने भाग लिया था।

चुनाव के बाद विधानसभा में कांग्रेस के 36, भाजपा के 19 विधायकों के साथ ही बसपा के सात, यूकेडी के चार ओर एनसीपी का एक विधायक निर्वाचित होकर पहुंचा। पहली विधानसभा के लिए तीन निर्दलीय विधायक भी निर्वाचित हुए थे। लेकिन 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में यह संख्या चार ही रह गई। तब भाजपा- कांग्रेस के साथ ही यूकेडी और बसपा का भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व रहा। इस चुनाव में यूकेडी की सीट घट कर तीन ही रह गई। जबकि बसपा ने पिछले चुनावों के मुकाबले एक सीट अतिरिक्त पाने में कामयाबी हासिल की। 

2012 से बदला ट्रेंड

दो दलीय राजनीति का स्पष्ट संकेत 2012 के विधानसभा चुनाव में उभरे। इस चुनाव में यूकेडी और बसपा की ताकत स्पष्ट रूप से कमजोर हो गई। क्षेत्रीय दलों की अगुवा रही यूकेडी का एक मात्र विधायक सदन में पहुंच पाया वहीं पहले दो चुनाव में सदन में दस प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली बसपा महज तीन विधायकों पर सिमट गई। हालांकि विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते होते बसपा की सदस्य संख्या सदन में दो ही रह गई। इसके बाद 2017 का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति में दो राष्ट्रीय दलों के अलावा अन्य की विदाई की घोषणा कर गया।

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Author: nirbhiknazar

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