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कॉपी-किताब से लेकर ड्रेस तक के लिए निर्धारित हैं प्राइवेट स्कूल की दुकानें, खामोशी अख़्तियार कर रहे अधिकारी…

देहरादून: देशभर में शिक्षा का नया सत्र शुरू होने के साथ ही स्कूलों की मनमानी का दौर भी शुरू हो चुका है। बात ऊधम सिंह नगर की करें तो यहां एक बार फिर हेल्प बुक्स के नाम पर आम जनता पर बेवजह बोझ डाला जा रहा है। यही नहीं प्राईवेट स्कूलों द्वारा हर बार की तरह इस बार भी शासन और हाईकोर्ट के आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही है। जहां एक तरफ एनसीईआरटी की किताबों में कंटेंट ना होने का बहाना देकर हेल्प बुक्स के चलन को बहुत ही आवश्यक बताया जा रहा है वहीं प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों का चलन भी जिले के प्राइवेट स्कूलों में आम हो गया है। सूत्रों की मानें तो इसके एवज में मोटी रकम वसूली जा रही है। यही नहीं कई प्राइवेट स्कूल तो अपने नाम से प्रिंट हुई कॉपीयों को भी लेने के लिए अभिभावकों को बाध्य कर रहे हैं और यह सब यहां के उप शिक्षा अधिकारी डॉ गुंजन अमरोही के संज्ञान में होने के बावजूद धड़ल्ले से चल रहा है।

इस मामले में जब हमारे संवाददाता ने उप शिक्षा अधिकारी डॉ. गुंजन अमरोही से बात की तो उन्होंने इस पर पूर्ण अनभिज्ञता जताई, जो की हास्यास्पद है। सूत्रों की मानें तो जब अभिभावक अपने बच्चों की रिपोर्ट कार्ड लेने स्कूल जाते हैं तो प्राइवेट स्कूलों द्वारा एक चिट उनके हाथ पर थमा दी जाती है जिसमें बुक स्टोर का नाम व पता लिखा होता है। यही नहीं हर बार कंटेंट का हवाला देते हुए हेल्प बुक्स भी बदल दी जाती है ताकि कोई भी बच्चा पुरानी किताबों को उपयोग में ना ला पाए। प्राईवेट स्कूलों की मनमानी सिर्फ किताबों तक ही सीमित नहीं है। स्कूल ड्रेस के लिए भी स्कूलों द्वारा एक चिट दी जाती है जिसमें संबंधित दुकान का नाम व पता लिखा होता है और मजे की बात यह कि इन दुकानों के अलावा और कहीं यह ड्रेस उपलब्ध नहीं होती, जिसके चलते अभिभावकों को मजबूरन इन दुकानों में लंबी लाईन लगाकर किताबें खरीदनी पड़ती हैं।

बता दें कि वर्ष 2018 में हाईकोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार प्राइवेट पब्लिशर्स की हेल्प बुक्स कोई भी विद्यालय बिना प्रशासन की अनुमति और उसके संज्ञान में लाए बिना व एक निर्धारित मूल्य के ऊपर नहीं लगा सकता। लेकिन हाईकोर्ट के इस आदेश की खुली अवहेलना की जा रही है। अब देखना यह है कि 5 वर्षो से एक ही जिले में आसीन उप शिक्षा अधिकारी डॉ. गुंजन अमरोही इस मामले में क्या संज्ञान लेती है या फिर हर बार की तरह इस बार भी अभिभावक स्कूलों की मनमानी सहने का मजबूर होते हैं।

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Author: nirbhiknazar

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