गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के मुरादनगर में स्थित है सुराना गांव. देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है, लेकिन सुराना गांव इस दिन को काले दिवस के रूप में मनाता है. इस गांव की लड़कियां अपने भाइयों की कलाई पर राखी नहीं बांधती हैं. माना जाता है कि ऐसा करने पर अपशगुन हो जाता है. आखिर क्यों सुराना गांव में नहीं मनाया जाता है रक्षाबंधन, तो चलिए आपको बताते हैं. वैसे तो रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के विश्वास और रक्षा का पर्व है. रिश्तों का एक अटूट बंधन है. इस दिन उत्साह और धार्मिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. लेकिन सुराना गांव के लोग इस दिन को अपशगुन का दिन मानते हैं. दरअसल इस गांव में छाबड़िया गोत्र के चंद्रवंशी अहीर क्षत्रियों का बसेरा है. राजस्थान के अलवर से निकलकर छाबड़िया गोत्र के अहिरों ने गांव की स्थापना की थी. सुराना नाम से पहले गांव को सोनगढ़ के नाम से जाना जाता था.

मोहम्मद गोरी गांव में मचाया था कत्लेआम
गांव सुराना में सैकड़ों साल पहले राजस्थान से आए पृथ्वीराज चौहान के वंशज सोन सिंह ने हिंडन नदी के किनारे अपना ठिकाना बसाया था. जिसका पता मोहम्मद गोरी को लग गया. इसके बाद मोहम्मद गोरी ने रक्षाबंधन वाले दिन ही पूरे गांव की जनता पर हाथियों से हमला करवा दिया. हाथियों के पैर के तले कुचले जाने से देखते ही देखते पूरा गांव खत्म हो गया. उस दिन के बाद से ही सुराना गांव वासी इस दिन को काला दिन बताते हैं.
रक्षाबंधन मनाने पर हो गई थी मृत्यु
वैसे तो गांव के बड़े-बुजुर्ग इस त्योहार को नहीं मनाते, नई पीढ़ी को समझाते भी हैं, लेकिन कुछ युवा पीढ़ी के द्वारा इस परंपरा को तोड़कर रक्षाबंधन मनाने की कोशिश की गई थी. जिसके बाद एक परिवार में किसी की मृत्यु हो गई तो दूसरे परिवार में अचानक परिवार वासियों की तबीयत खराब होने लगी. इस तरह की घटनाओं के बाद गांव वालों के समझाने बुझाने के बाद रक्षाबंधन का त्योहार मनाने वाले लोगों ने गांव के कुलदेवता से माफी मांगी. ग्रामीण बताते हैं कि इस दिन को श्राप लगा हुआ है. इसलिए रक्षाबंधन का त्योहार मनाने पर समस्याएं खड़ी हो जाती हैं.