हल्द्वानी. उत्तराखंड में भारती जनता पार्टी के संगठन की कमान संभालते ही नये प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने पहले संगठन में कई बदलाव कर बड़ा उलटफेर किया, तो अब एक और नयापन लाने की कोशिश में है. असल में अब भाजपा ने संगठन के लिहाज से नये ज़िले बनाने का फैसला किया है. इस तरह से BJP सभी 19 जिला अध्यक्षोंं का चयन जल्द करने का दावा कर रही है और पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है. अब सवाल यही दिलचस्प है कि 5 साल पहले अमित शाह ने जब ज़्यादा ज़िलों वाली इस व्यवस्था को नकार दिया था, तो इस बार क्यों उसी व्यवस्था पर संगठन ने भरोसा जताया है.
बीजेपी के प्रदेश महामंत्री राजेंद्र सिंह बिष्ट के मुताबिक वैसे तो उत्तराखंड में सरकारी स्तर पर 13 ज़िले हैं, लेकिन कई ज़िलों की भौगोलिक स्थिति काफी मुश्किल है. इस लिहाज से बीजेपी ने भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए नए सांगठनिक ज़िले बनाने का फैसला किया है. बिष्ट के मुताबिक अभी तक बीजेपी संगठन के लिहाज़ से 13 ज़िला अध्यक्ष और एक महानहर अध्यक्ष थे. अब पांच नए ज़िले बनाने के बाद बीजेपी 14 के बजाय 19 सांगठनिक ज़िला अध्यक्ष बनाकर राजनीतिक व्यूह रचना करेगी.

केंद्र से ऐसे मिली 19 ज़िलाध्यक्षों को हरी झंडी
उत्तरकाशी, चमोली, नैनीताल, ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून, देहरादून महानगर, चंपावत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, पिथौरागढ़ के अलावा इस बार बीजेपी ने ऋषिकेश, रुड़की, कोटद्वार, काशीपुर और रानीखेत को संगठन के लिहाज़ से नये ज़िले बनाने का निर्णय लिया है.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के मुताबिक उन्होंने इस तरह का प्रस्ताव केंद्रीय नेतृत्व के सामने रखा था, जिसे केंद्रीय नेतृत्व ने हरी झंडी दे दी. हालांकि इससे पहले भी 2017 से पहले बीजेपी ने संगठन के लिहाज़ से 22 ज़िले बनाए थे, लेकिन पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इन ज़िलों को खत्म करने का फरमान सुना दिया था. तबसे बीजेपी 13 ज़िला अध्यक्षों और एक महानगर अध्यक्ष के साथ काम कर रह रही थी.
आखिर क्यों हुआ यह फेरबदल?
अमित शाह का कहना था कि जितने प्रशासनिक ज़िले हैं, उसके हिसाब से ही संगठन चले ताकि कन्फ्यूजन न हो. तब अमित शाह ने ज़िला अध्यक्षों की अलग-अलग बैठक और प्रेज़ेंटेशन भी लिये थे. प्रेज़ेंटेशन में कई ज़िलाध्यक्ष बोल भी नहीं पाए थे और शाह नाराज़ भी हुए थे. शाह ने कहा था ऐसे ज़िले बना कर क्या फायदा है. इस बार बीजेपी के कई नेताओं ने फिर वही व्यवस्था लागू करने के लिए संगठन से सिफारिश की. तर्क है कि इस व्यवस्था से ज़्यादा से ज़्यादा पार्टी कार्यकर्ता संगठन से जुड़ सकें.