लखनऊ: प्रदेश में गैर मान्यता प्राप्त मदरसों में देवबंद का विश्वविख्यात मदरसा दारुल उलूम भी है। इसने मदरसा बोर्ड से मान्यता नहीं ले रखी है। यह खबर सुर्खियां बनते ही उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद बैकफुट पर आ गया। बोर्ड के चेयरमैन डा. इफ्तिखार अहमद जावेद ने रविवार को कहा कि दारुल उलूम जैसे मदरसों को बोर्ड से मान्यता लेने की कोई जरूरत नहीं है।

बैकफुट पर आया उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद
- प्रदेश सरकार गैर मान्यता प्राप्त मदरसों का सर्वे करा रही है। प्रदेश में 7500 गैर मान्यता प्राप्त मदरसे मिले हैं। इनमें देवबंद का दारुल उलूम मदरसा भी है।
- रविवार को खबर प्रकाशित होने के बाद बोर्ड के चेयरमैन ने बयान जारी कर कहा कि दारुल उलूम देवबंद जो खुद देश भर में 4500 से ज्यादा मदरसों को मान्यता दे चुका हो उसकी निष्ठा व शिक्षा के ऊपर बहस करना सूरज को दीया दिखाने जैसा है।
- 1857 में जब आजादी की पहली लड़ाई लड़ी गई और अंग्रेजों ने शिक्षा के तमाम केंद्रों को बंद किया उसी के बाद दारुल उलूम, देवबंद की स्थापना हुई थी।
- डा. जावेद ने कहा कि 156 वर्षों से यह संस्था देश व दुनिया में अपनी शिक्षा और विचारधारा के लिए जानी जाती है।
- इतने बड़े कद की संस्था जो खुद मान्यता दे कर शिक्षा को बढ़ावा दे रही हो उसे उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड से मान्यता लेने की कोई जरूरत नहीं है।
मदरसों के बच्चों की शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने पर फोकस
बोर्ड के चेयरमैन डा. इफ्तिखार अहमद जावेद कहा कि इस सर्वे से प्रदेश में खुले नए मदरसों के बारे में जानकारी प्राप्त करना है जिससे सरकार वहां पढ़ने वाले बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर उन्हें भी देश की मुख्यधारा में शामिल किया जा सके। मदरसा बोर्ड ने पिछले सात वर्षों में किसी मदरसे को मान्यता नहीं दी है। इसलिए सर्वे के बाद गैर मान्यता प्राप्त मदरसों को मान्यता देना भी एक उद्देश्य है।
Source : “जागरण”