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‘उत्तराखंड में अतिक्रमण के नाम पर लैंड जिहाद नहीं चलने देंगे’, शब्दोत्सव कार्यक्रम में बोले सीएम धामी

दिल्ली/देहरादून:  देवभूमि उत्तराखंड का देवत्व और सांस्कृतिक स्वरूप बनाए रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। पहले की सरकारों ने इसपर ध्यान नहीं दिया, इसके चलते कई पहाड़ी इलाकों पर बाहरी लोग कब्जा कर चुके हैं। सरकारी जमीनों पर हरी-नीली चादरें चढ़ाकर अतिक्रमण किया जा रहा है, जोकि सुनियोजित सोची-समझी साजिश है।

इस लैंड जिहाद को हम नहीं चलने देंगे। ये बातें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने मेजर ध्यान चंद स्टेडियम में तीन दिवसीय शब्दोत्सव के दौरान कहीं। चर्चा में धामी ने कहा कि हमने संवैधानिक तरीके से सरकारी जमीनों से अवैध कब्जों को हटाने का काम शुरू किया और इसके तहत 10 हजार एकड़ भूमि अतिक्रमण मुक्त कर चुके हैं। करीब 600 अवैध ढांचे गिराए जा चुके हैं, जहां कोई धार्मिक अवशेष, चिन्ह या निशान नहीं मिले।

हरिद्वार में दुनिया की सबसे बड़ी धर्मध्वजा लहराने की तैयारी चल रही है, जो वैश्विक स्तर पर सनातन संस्कृति का प्रतीक बनेगी। उन्होंने कहा कि मदरसों में शिक्षा के नाम पर कुछ अलग ही खेल चल रहा है, इसलिए उत्तराखंड में एक जुलाई 2026 के बाद ऐसे मदरसे बंद किए जाएंगे जहां राज्य का निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं पढ़ाया जा रहा है। देवभूमि में कबिलाई मानसिकता नहीं पनपने देंगे और हर समुदाय को लाभ पहुंचाने वाले शिक्षा के मंदिर स्थापित करेंगे।

फ्लाइट से कम समय में सड़क से पहुंचेंगे देहरादून

चारधाम और अन्य धार्मिक क्षेत्रों में तेजी से विकास हुआ है। दिल्ली से देहरादून एलिवेटेड रोड का काम जल्द खत्म हो जाएगा। इसके बाद दिल्ली से देहरादूर जाने वाले लोग फ्लाइट के बजाय सड़क से जल्दी पहुंच जाएंगे। देहरादून, ऋषिकेश व हरिद्वार में आने वाले समय में ट्रैफिक दबाव बढ़ने की संभावना को देखते हुए रिंग रोड का प्रस्ताव भी तैयार किया गया है, ताकि पर्यटकों और स्थानीय लोगों दोनों को सुविधा मिल सके।

भारत ही इकलौता देश जिसके दो नाम: डॉ. मनमोहन

भारत को समझना बेहद जरूरी है। दुनिया में शायद ही कोई और देश हो जिसके दो नाम हों। भारत में राष्ट्र की अवधारणा पश्चिमी नेशन से अलग है। पश्चिम में नेशन की अवधारणा 16वीं सदी में विकसित हुई, जबकि भारत में राष्ट्र सदैव समाज के रूप में मौजूद रहा है।

स्वदेशीकरण का अर्थ है दूसरों पर न्यूनतम निर्भरता। ये बातें आरएसएस के राष्ट्र कार्यकारिणी सदस्य डा. मनमोहन वैद्य ने ”भारत की भारतीय अवधारणा” सत्र में कहीं। उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा गया कि आज की शिक्षा नौकरी मांगने वाले युवा तैयार कर रही है, जिससे बेरोजगारी बढ़ रही है।

भारत को केवल कृषि प्रधान देश बताकर सीमित कर दिया गया, जबकि वह हमेशा से उद्योग प्रधान भी रहा है। कभी भारत दुनिया को अनाज बेचता नहीं, बल्कि खिलाता था। स्टील, चमड़ा, पीतल और कपड़ा जैसे उद्योग घर-घर में थे।

विविधता में एकता के संदर्भ में कहा गया कि भारत विविध संस्कृतियों का देश नहीं, बल्कि ऐसी एक संस्कृति का देश है जो विविधता को स्वीकार करती है। उन्होंने कहा कि जेन जी आशावादी पीढ़ी है और जो ठान लेती है, उसे पूरा करके दिखाती है। उन्हें उपदेश देने की बजाय संवाद करना चाहिए, प्रश्नों के माध्यम से सोचने और खोजने का अवसर देना चाहिए।

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Author: nirbhiknazar

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