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उत्तराखंड: UCC का संशोधित अध्यादेश लागू, लिव-इन केस में किया बदलाव, एक क्लिक में जानिए सब कुछ

देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने समान नागरिक संहिता उत्तराखंड 2024 में आवश्यक संशोधनों हेतु समान नागरिक संहिता (संशोधन) अध्यादेश 2026 को राज्यपाल की स्वीकृति के उपरांत लागू कर दिया गया है. यह अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 213 के अंतर्गत राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) द्वारा जारी किया गया है. यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है.

बता दें कि 27 जनवरी 2025 को उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता उत्तराखंड 2024 लागू किया था. कल 27 जनवरी 2026 को उत्तराखंड में यूसीसी लागू हुए पूरा एक साल हो जाएगा. इस दिन को उत्तराखंड सरकार भी यूसीसी दिवस के रुप में मना रही है. इस मौके पर प्रदेश भर में कई कार्यक्रम किए जाएंगे. इस कानून के लागू होने के बाद समय-समय पर परिस्थितियों और कानून के मौजूद कुछ खामियों को दूर करने के लिए संशोधन किया गया.

बीते साल अगस्त 2025 में यूसीसी में कुछ संशोधन किए गए थे, जिन्हें मंजूरी के लिए लोकभवन (राजभवन) को भेजा गया था, लेकिन प्रस्ताव में कुछ तकनीकी खामियां थी, जिसके चलते लोकभवन ने यूसीसी संशोधन प्रस्ताव को 18 दिसंबर 2025 को वापस लौटा दिया था. इसके बाद उन कमियों को दूर करते हुए यूसीसी संशोधन प्रस्ताव को 15 जनवरी को हुई मंत्रिमंडल के सम्मुख रखा गया, जिस पर मंत्रिमंडल ने अध्यादेश के जरिए आवश्यक संशोधन की मंजूरी दे दी थी. इस संशोधन प्रस्ताव को धर्मस्व एवं संस्कृति विभाग की ओर से राज्यपाल की मंजूरी के लिए लोक भवन भेजा गया था. आज 26 जनवरी को यूसीसी के संशोधन प्रस्ताव पर राज्यपाल ने मोहर लगा दी है.

संशोधन के बाद ये प्रमुख बिंद लागू

  • आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के स्थान पर अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 तथा दंडात्मक प्रावधानों के लिए भारतीय न्याय संहिता, 2023 को लागू किया गया है.
  • धारा 12 के अंतर्गत ‘सचिव’ के स्थान पर ‘अपर सचिव’ को सक्षम प्राधिकारी नामित किया गया है.
  • उप-पंजीयक द्वारा निर्धारित समय-सीमा में कार्रवाई न किए जाने की स्थिति में प्रकरण स्वतः पंजीयक एवं पंजीयक जनरल को अग्रेषित किए जाने का प्रावधान किया गया है.
  • उप-पंजीयक पर लगाए गए दंड के विरुद्ध अपील का अधिकार प्रदान किया गया है और दंड की वसूली भू-राजस्व की भांति किए जाने का प्रावधान जोड़ा गया है.
  • विवाह के समय पहचान से संबंधित गलत प्रस्तुति को विवाह निरस्तीकरण का आधार बनाया गया है.
  • विवाह एवं लिव-इन संबंधों में बल, दबाव, धोखाधड़ी अथवा विधि-विरुद्ध कृत्यों के लिए कठोर दंडात्मक प्रावधान सुनिश्चित किए गए हैं.
  • लिव-इन संबंध की समाप्ति पर पंजीयक द्वारा समाप्ति प्रमाण पत्र जारी किए जाने का प्रावधान किया गया है.
  • अनुसूची-2 में ‘‘विधवा’’ शब्द के स्थान पर ‘जीवनसाथी’ शब्द का प्रतिस्थापन किया गया है.
  • विवाह, तलाक, लिव-इन संबंध एवं उत्तराधिकार से संबंधित पंजीकरण को निरस्त करने की शक्ति पंजीयक जनरल को प्रदान की गई है.
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Author: nirbhiknazar

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