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रिवर्स पलायन से आबाद होंगे घोस्ट विलेज, गढ़वाल सांसद ने गांव में एक बच्चे का जन्मदिन और त्योहार मनाने की अपील

पौड़ी: गढ़वाल से लोकसभा सांसद अनिल बलूनी पौड़ी जिले के कोट ब्लॉक स्थित पातली गांव पहुंचे. पातली गांव आज पहाड़ के उन निर्जन गांवों में शामिल है, जिन्हें आमतौर पर घोस्ट विलेज कहा जाता है. इस दौरे का उद्देश्य पहाड़ में बढ़ते पलायन और घोस्ट विलेज की गंभीर समस्या पर जन-जागरण करना व प्रवासी ग्रामीणों का ध्यान अपने मूल गांवों की ओर आकर्षित करना रहा. इस अवसर पर पातली गांव से पलायन कर चुके ग्रामीण देहरादून समेत अन्य महानगरों से विशेष रूप से अपने गांव लौटे थे. इसके साथ ही आसपास के कई गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग पातली पहुंचे. सांसद अनिल बलूनी ने प्रवासी ग्रामीणों के साथ संवाद करते हुए पहाड़ के खाली होते गांवों की पीड़ा और उसके दूरगामी दुष्परिणामों पर विस्तार से चर्चा की.

गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी ने कहा कि पहाड़ के गांवों का सुनसान होना केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है. उन्होंने कहा कि अपनी आंखों के सामने अपने ही गांव को घोस्ट विलेज में तब्दील होते देखना बेहद तकलीफदेह है. यह केवल घरों के खाली होने का नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा के सूने होने का संकेत है. संवाद के दौरान प्रवासी ग्रामीणों की आंखों में अपने गांवों के उजड़ने की पीड़ा साफ दिखाई दी. वे अपने पैतृक गांवों से जुड़ी स्मृतियों, खेत-खलिहान, देवस्थानों और सामाजिक ताने-बाने के बिखरने को लेकर भावुक नजर आए. ग्रामीणों ने चिंता जताई कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाली पीढ़ियां अपने मूल गांवों और संस्कृति से पूरी तरह कट जाएंगी.

सांसद बलूनी ने ग्रामीणों से अपने गांवों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने की अपील की और सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ लेकर रिवर्स माइग्रेशन की दिशा में आगे बढ़ें. उन्होंने आश्वासन दिया कि पहाड़ के गांवों को पुनर्जीवित करने, रोजगार के अवसर बढ़ाने और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए वे लगातार प्रयासरत रहेंगे. यह संवाद केवल एक बैठक नहीं, बल्कि पहाड़ के भविष्य को बचाने की एक भावनात्मक पहल के रूप में सामने आया, जिसने प्रवासी और स्थानीय ग्रामीणों को अपने गांवों से दोबारा जुड़ने का संदेश दिया.

गढ़वाल सांसद ने लोगों से अपील की कि हमें कम से कम एक लोकपर्व और अपने परिवार के एक सदस्य का जन्मदिन अपने गांव में मनाना चाहिए. एक संतान का विवाह कार्यक्रम भी अपने गांव में करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर हमने ऐसा किया तो हमारे बच्चे, हमारे परिवार के सदस्य भी स्वाभाविक रूप से अपने गांव से जुड़ेंगे, अपनी विरासत और संस्कृति से जुड़ेंगे और अपने पुरुखों से परिचित होंगे. इससे घोस्ट विलेज भी गुलजार होंगे. कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी वाइब्रेंट बॉर्डर विलेज और वेडिंग इन उत्तराखंड के जरिये पहाड़ को आबाद करने का बीड़ा उठाया है तो क्या हम अपने निजी आयोजनों के लिए भी अपना गांव नहीं आ सकते हैं?

अनिल बलूनी ने कहा कि मैंने पहाड़ और अपने निर्जन गांवों को आबाद करने के उद्देश्य से इगास और अपना वोट, अपने गांव जैसे कार्यक्रम शुरू किए. जिससे जमीन पर अच्छा बदलाव आया है. भाजपा सांसद ने ग्रामीणों से पहाड़ के कम होते राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि पहाड़ के गांवों को बचाना उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और यहां के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से भी बेहद जरूरी है. हमारा सीमांत प्रदेश, चीन से सटा हुआ है, इस लिहाज से उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण, हमारे सोल्जर सरीखे होते हैं.

दूसरी वजह पहाड़ में निर्वाचन क्षेत्रों की लगातार घटती संख्या है. पौड़ी जिले में पहले 8 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र थे, जो अब घटकर 06 रह गए हैं. ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले समय में केवल 4 या 5 विधानसभा रह जाए. इसी प्रकार चमोली जिले में 4 विधानसभा थी, आने वाले समय में 2 रह जाए, ऐसा भी हो सकता है. नैनीताल, पिथौरागढ़ में भी विधानसभा सीटें कम हो रही हैं. ये सभी लोगों के लिए सोचने का विषय है. पहाड़ की आवाज उठाने के लिए पहाड़ को आबाद रखना बेहद जरूरी है.

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Author: nirbhiknazar

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