देहरादून। उत्तराखंड में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद सियासी हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। इस बीच लैंसडाउन से भाजपा विधायक Dilip Rawat के एक बयान ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि वह खुद कुछ महीनों के लिए मंत्री नहीं बनना चाहते थे।
दरअसल, मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami द्वारा हाल ही में मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया था। सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में हुए इस विस्तार को लेकर पहले से ही राजनीतिक गलियारों में कई तरह के सवाल उठ रहे थे। ऐसे में भाजपा विधायक का यह बयान सामने आने के बाद चर्चाओं का दौर और तेज हो गया है।
विधायक के बयान से बढ़ी राजनीतिक चर्चा
भाजपा विधायक दिलीप रावत ने कहा कि सरकार का कार्यकाल अब ज्यादा नहीं बचा है और इतने कम समय के लिए मंत्री बनना उनके लिए व्यावहारिक नहीं होता। उनके इस बयान को जहां एक ओर व्यक्तिगत राय के रूप में देखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे मंत्रिमंडल विस्तार के औचित्य पर सवाल के रूप में भी लिया जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले मंत्रिमंडल विस्तार का फैसला पहले से ही चर्चा में था। लोगों के मन में यह सवाल था कि इतने कम समय में नए मंत्री अपने विभागों में कितना प्रभावी काम कर पाएंगे।
कांग्रेस ने साधा निशाना
भाजपा विधायक के बयान पर कांग्रेस नेता Harak Singh Rawat ने भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि दिलीप रावत का बयान आधा सही और आधा गलत है।
हरक सिंह रावत ने कहा कि भले ही दिलीप रावत यह कह रहे हों कि वह मंत्री नहीं बनना चाहते थे, लेकिन वास्तविकता यह है कि उन्हें मौका ही नहीं मिला।
उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा में मंत्री बनने के लिए केवल योग्यता ही नहीं, बल्कि बड़े नेताओं की कृपा भी जरूरी होती है।
नए मंत्रियों के सामने चुनौती
हरक सिंह रावत ने कहा कि सरकार के पास अब सीमित समय बचा है। ऐसे में जो नए मंत्री बनाए गए हैं, उनके सामने विभाग को समझने और उस पर पकड़ बनाने की बड़ी चुनौती होगी। उन्होंने कहा कि किसी भी विभाग को समझने में ही काफी समय लग जाता है और जब तक मंत्री पूरी तरह काम शुरू करेंगे, तब तक चुनाव की घोषणा हो सकती है।
चुनावी माहौल में बढ़ी सियासत
उत्तराखंड में चुनावी माहौल धीरे-धीरे तेज होता जा रहा है। भाजपा जहां चुनावी मोड में नजर आ रही है, वहीं कांग्रेस भी लगातार सरकार पर हमले कर रही है।
ऐसे में दिलीप रावत के इस बयान ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा इस बयान को किस तरह संभालती है और क्या विपक्ष इसे चुनावी मुद्दा बनाने में सफल होता है।