चन्दन कुमार झा
देहरादून: उत्तराखंड की सियासत में एक नाम ऐसा है जिसके बिना कांग्रेस की कल्पना भी नहीं की जा सकती – हरीश रावत। लेकिन मौजूदा चुनाव अभियान समिति से ‘हरदा’ को बाहर रखकर पार्टी ने खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।
‘हरदा’ ही कांग्रेस का असली चेहरा
- जनाधार का दूसरा नाम: पहाड़ से लेकर मैदान तक, हरीश रावत अकेले नेता हैं जिनकी सभाओं में आज भी भीड़ खिंची चली आती है। 2022 की हार के बावजूद उनके नाम पर वोट पड़ता है। चार नेताओं को जिम्मेदारी देने से वो जनाधार पैदा नहीं होगा जो रावत एक रैली में जुटा देते हैं।
- भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी हों या पूर्व सीएम त्रिवेंद्र रावत, भाजपा का हर नेता जानता है कि मैदान में अगर कोई टक्कर दे सकता है तो वो सिर्फ हरीश रावत हैं। उन्हें साइडलाइन करना सीधे-सीधे भाजपा को वॉकओवर देना है।
- संगठन और सरकार का अनुभव: केंद्र में मंत्री, राज्य में मुख्यमंत्री – रावत के पास वो अनुभव है जो मौजूदा समिति के चारों नेताओं के पास मिलाकर भी नहीं है। चुनाव सिर्फ नारेबाजी से नहीं, रणनीति से जीते जाते हैं और रणनीति का नाम ही हरीश रावत है।
कार्यकर्ता में मायूसी, विपक्ष में जश्न
चुनाव अभियान समिति की सूची जारी होते ही कांग्रेस कार्यालय में सन्नाटा पसर गया। पुराने कार्यकर्ता दबी जुबान में कह रहे हैं – “हरदा के बिना प्रचार किसके भरोसे करेंगे?”। वहीं भाजपा खेमा इस फैसले से गदगद है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कांग्रेस ने हमारा काम आसान कर दिया”।
इतिहास गवाह है
2002 में नारायण दत्त तिवारी की सरकार बनी तो उसके पीछे हरीश रावत की रणनीति थी। 2012 में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी तो चेहरा फिर रावत ही थे। 2017 और 2022 में जब पार्टी हारी, तब भी सबसे ज्यादा सीटें रावत के प्रभाव वाली सीटों पर ही आईं। आंकड़े बताते हैं कि हरीश रावत के बिना कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गया है।
2029 से पहले चेतावनी
अगर कांग्रेस आलाकमान को लगता है कि चार नए चेहरों से वो पहाड़ का मिजाज बदल देगी तो ये उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। उत्तराखंड की सियासत भावनाओं से चलती है और यहां की भावना आज भी ‘हरदा’ के साथ जुड़ी है।
चुनाव अभियान समिति बनाना अच्छी बात है, लेकिन उस समिति का सेनापति ही नदारद हो तो लड़ाई शुरू होने से पहले ही हारी हुई मानी जाएगी। कांग्रेस को समझना होगा – हरीश रावत व्यक्ति नहीं, उत्तराखंड में पार्टी की पहचान हैं। उनके बिना कांग्रेस सिर्फ नाम बचेगा, काम नहीं।