चन्दन कुमार झा
देहरादून: उत्तराखंड कांग्रेस में विधानसभा चुनाव 2029 की तैयारियों से पहले ही गुटबाजी खुलकर सामने आ गई है। पार्टी हाईकमान ने राज्य में चुनाव अभियान समिति का गठन तो कर दिया, लेकिन इस लिस्ट से दो सबसे बड़े चेहरे ही गायब कर दिए गए।
किसे मिली जगह, कौन हुआ बाहर?
चुनाव अभियान समिति में चार नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस का सबसे बड़ा जनाधार रखने वाले नेता हरीश रावत का नाम इस सूची में नहीं है।
हरीश रावत के साथ-साथ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य को भी समिति से दूर रखा गया है। यशपाल आर्य दलित समाज का बड़ा चेहरा माने जाते हैं और सदन में सरकार को घेरने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है।
साफ दिख रही अंदरूनी खींचतान
1-‘हरदा’ को साइडलाइन करने की साजिश?: हरीश रावत को 2022 में सीएम फेस घोषित करने के बाद भी पार्टी चुनाव हार गई थी। उसके बाद से ही प्रदेश संगठन में रावत विरोधी खेमा हावी है। अब चुनाव अभियान समिति से बाहर रखकर साफ संदेश दिया गया है कि 2029 की लड़ाई ‘हरदा’ के बिना लड़ी जाएगी।
2-नेता प्रतिपक्ष की अनदेखी: नियमतः चुनाव से जुड़ी हर बड़ी समिति में नेता प्रतिपक्ष को जगह दी जाती है। यशपाल आर्य को बाहर रखना बताता है कि प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष के बीच तालमेल बिल्कुल नहीं है। सदन और संगठन, दोनों जगह कांग्रेस दोफाड़ दिख रही है।
3-दिल्ली से चल रहा रिमोट: सूत्रों की मानें तो चार नेताओं के नाम दिल्ली में बैठे एक खेमे ने तय किए हैं। प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से राय तक नहीं ली गई। इससे साफ है कि उत्तराखंड कांग्रेस में फैसले अब देहरादून की बजाय दिल्ली दरबार से हो रहे हैं।
2029 से पहले ही बिखराव के संकेत
कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस फैसले के बाद नाराजगी है। हरीश रावत समर्थक खुलकर कह रहे हैं कि “बिना हरदा के कांग्रेस का चुनाव में जाना आत्महत्या करने जैसा है”। वहीं यशपाल आर्य गुट भी इस अपमान से आहत है।
चुनाव अभियान समिति का गठन एकजुटता दिखाने के लिए होता है, लेकिन उत्तराखंड कांग्रेस ने इसे गुटबाजी का नया अखाड़ा बना दिया है। जिस पार्टी में पूर्व सीएम और नेता प्रतिपक्ष को ही दरकिनार कर दिया जाए, वो भाजपा का मुकाबला कैसे करेगी, ये बड़ा सवाल है।
फिलहाल इतना तय है कि 2029 का चुनावी बिगुल बजने से पहले ही कांग्रेस में सिर-फुटव्वल शुरू हो गई है।