देहरादून: बिहार की सियासत में इस बार रिजल्ट आने के बाद जो सबसे बड़ा ट्रेंड बना है वो जीत का जश्न नहीं, बल्कि हार की समीक्षा है। प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज भले ही बांकीपुर सीट उपचुनाव में सफल रही हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों, चाय की दुकानों और सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर है कि भाजपा को बांकीपुर जो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की परंपरागत सीट है उस पर झटका क्यों लगा।
राजनीति के जानकार इसे “नैरेटिव की हार” कह रहे हैं। यानी आंकड़े चाहे जो कहें, लेकिन जमीन पर जो मैसेज गया है वो भाजपा के लिए चिंताजनक है।
पीके फैक्टर: वोटर का नया विकल्प या वोट कटवा?
प्रशांत किशोर ने पिछले 2 साल से “बिहार फर्स्ट” का नारा देकर युवाओं, शिक्षित वर्ग और पहली बार वोट करने वालों को टारगेट किया। जन सुराज को भले ही 4-5% वोट मिले हों, लेकिन भाजपा का आकलन है कि ये वोट सीधे NDA के खाते से गए।
एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हम पिछले विधानसभा में15 सीटें इसलिए हारे क्योंकि वहां 8 से 12 हजार वोट पीके ले गए। वो जीते या न जीते, नुकसान हमारा हुआ।” इसी कारण पार्टी के अंदर पीके को “B टीम” से ज्यादा “वोट कटवा” के रूप में देखा जा रहा है।
भाजपा की हार के 5 बड़े कारण
- 20 साल की एंटी-इनकंबेंसी: नीतीश कुमार के साथ गठबंधन में 20 साल की सरकार का बोझ भाजपा पर भी आया। रोजगार, पलायन, पेपर लीक और महंगाई के मुद्दे फिर जिंदा हो गए। जमीनी कार्यकर्ता मान रहे हैं कि लोगों में “बदलाव” की चाह थी।
- संगठन और सरकार के बीच गैप: जमीनी कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि सरकारी योजनाओं का क्रेडिट नीचे तक नहीं पहुंचा। बूथ स्तर पर कार्यकर्ता हतोत्साहित दिखे। टिकट वितरण में भी कई जगह पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया गया।
- युवा और महिला वोट का खिसकना: जन सुराज ने “शिक्षा और रोजगार” को मुद्दा बनाया। इससे शहरी युवा और पहली बार वोटर भाजपा से दूर हुआ। वहीं महिलाओं में भी महंगाई को लेकर नाराजगी देखी गई।
- गठबंधन की कमजोरी: JDU और भाजपा के बीच समन्वय की कमी कई सीटों पर दिखी। दोनों दलों के कार्यकर्ता एक-दूसरे के लिए पूरी ताकत से नहीं उतरे। इसका फायदा विपक्ष को मिला।
- नैरेटिव हार: चुनाव प्रचार में भाजपा “विकास और डबल इंजन” की बात करती रही, लेकिन विपक्ष “बेरोजगारी और पलायन” को मुद्दा बनाने में सफल रहा। मीडिया में भी “पीके ने भाजपा को घेरा” जैसी हेडलाइन ज्यादा चली।
सोशल मीडिया और मीडिया का रोल
Twitter, Facebook और WhatsApp पर #BJP_Haar_Ke_Karan 2 दिन तक ट्रेंड करता रहा। राजनीतिक यूट्यूब चैनलों पर “भाजपा क्यों हारी” वाले वीडियो को सबसे ज्यादा व्यूज मिले। इससे आम कार्यकर्ता में भी निराशा का भाव आया।
इस हार के बाद भाजपा के सामने 3 चुनौतियां हैं:
- आत्ममंथन: दिल्ली और पटना में हार के कारणों की रिपोर्ट बनेगी। संगठन में बदलाव तय माने जा रहे हैं।
- गठबंधन धर्म: JDU अब ज्यादा मुखर होकर अपनी बात रखेगा। सीट बंटवारे में उसकी बार्गेनिंग बढ़ेगी।
- जन सुराज को जवाब: भाजपा को पीके के “रोजगार मॉडल” का काट खोजना होगा, वरना 2029 में ये वोट बैंक और बढ़ सकता है।
चुनाव में हार-जीत लगी रहती है, लेकिन इस बार भाजपा की हार की चर्चा पीके की जीत से ज्यादा है। क्योंकि ये हार सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि “भरोसे” की मानी जा रही है। अब देखना ये है कि पार्टी इस भरोसे को कितनी जल्दी वापस पाती है।