देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में एक कहावत अक्सर कही जाती है – “हरीश रावत फिर भी हरीश रावत हैं।” सत्ता हो या संघर्ष, सरकार हो या संगठन, यह शख्सियत हर परिस्थिति में अपनी मौजूदगी दर्ज कराती रही है। गिरना, उठना और उठकर फिर चल देना, यही हरीश रावत की असली फितरत है।
आज जब कांग्रेस के भीतर बदलाव की चर्चाएं तेज हैं, तब एक सवाल सबसे बड़ा है कि क्या कांग्रेस रूपी बरगद के इस सबसे मजबूत पेड़ को उखाड़ कर फेंकना इतना आसान होगा? जमीनी हकीकत कहती है, नहीं।
ग्राम प्रधान से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर
हरीश रावत का राजनीतिक जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। 27 अप्रैल 1948 को अल्मोड़ा जिले के मोहनरी गांव में जन्मे हरीश रावत ने राजनीति की शुरुआत गांव के ब्लॉक प्रमुख के तौर पर की। लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए और एलएलबी की डिग्री लेने के बाद वे ट्रेड यूनियन और युवा कांग्रेस से जुड़े।
1980 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और भाजपा के दिग्गज मुरली मनोहर जोशी को अल्मोड़ा से हराकर संसद पहुंचे। यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी और संजय गांधी ने उन्हें अपने हाथों से तैयार किया। इसके बाद वे 1984 और 1989 में भी अल्मोड़ा से सांसद चुने गए। वह कांग्रेस के इतिहास में पांच बार सांसद रहे हैं। 2002 से 2008 तक वे राज्यसभा सांसद रहे और उत्तराखंड से राज्यसभा में राज्य का प्रतिनिधित्व किया। 2009 में वे हरिद्वार लोकसभा सीट से जीतकर फिर संसद पहुंचे।
केंद्र में मंत्री के तौर पर दायित्व
हरीश रावत केवल राज्य के नेता नहीं, केंद्र में भी उनका लंबा अनुभव रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार में उन्हें लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गईं –
– 2009-2011: श्रम और रोजगार मंत्रालय में राज्य मंत्री
– 2011-2012: कृषि मंत्रालय और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय में राज्य मंत्री
– 2011-2012: संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री
– 2012-2014: जल संसाधन मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री
केंद्रीय मंत्री के तौर पर उन्हें एक मेहनती और जमीन से जुड़े नेता के रूप में जाना गया।
कांग्रेस संगठन में बरगद जैसी भूमिका
संगठन में हरीश रावत का कद किसी मुख्यमंत्री से कम नहीं रहा।
– 1980 से वे लगातार कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय प्रमुख रहे हैं।
– उत्तराखंड राज्य बनने के बाद 2000 से 2007 तक वे उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पहले अध्यक्ष रहे। यह वह समय था जब उन्होंने उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति का नेतृत्व करते हुए राज्य आंदोलन में भी अहम भूमिका निभाई।
– इसके बाद वे कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के स्थायी आमंत्रित सदस्य और उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई में बने रहे।
पार्टी के लिए वे एक ऐसे नेता हैं जो ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण में ठाकुर समुदाय के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभरे। पहाड़ में आज भी उन्हें प्यार से ‘हरदा’ कहा जाता है।
मुख्यमंत्री के तौर पर कार्यकाल
हरीश रावत तीन बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। पहली बार 1 फरवरी 2014 को विजय बहुगुणा के स्थान पर उन्होंने कमान संभाली। 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद जब राज्य पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा था, तब उनके कार्यकाल को पुनर्निर्माण के लिए याद किया जाता है।
दूसरी बार 21 अप्रैल 2016 को एक दिन के लिए और तीसरी बार 11 मई 2016 से 18 मार्च 2017 तक वे मुख्यमंत्री रहे। बीच में 9 बागी विधायकों और राष्ट्रपति शासन के संकट के बावजूद उन्होंने विधानसभा में बहुमत साबित कर वापसी की, जिसे राजनीतिक हलकों में ‘अल्टिमेट कमबैक’ कहा गया।
क्यों नहीं उखड़ सकता यह बरगद?
हरीश रावत की ताकत उनकी कुर्सी नहीं, उनका जनसंपर्क है। उत्तराखंड के 13 जिलों में उनका अपना निजी कार्यकर्ता नेटवर्क है। वह कार्यकर्ता जो पद के लिए नहीं, बल्कि व्यक्तिगत निष्ठा से जुड़ा है। ब्लॉक स्तर से लेकर बूथ स्तर तक उनका सीधा संपर्क है।
इसलिए राजनीतिक पंडित मानते हैं कि चुनावी नतीजे चाहे जो भी रहें, कांग्रेस रूपी बरगद के इस पेड़ को उखाड़ना आसान नहीं है। क्योंकि इसकी जड़ें देहरादून के कार्यालयों में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के गांवों की जमीन में धंसी हुई हैं।