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मिशन 2027 के लिए भाजपा ने तेज की संगठनात्मक तैयारी, कांग्रेस में नेतृत्व के तालमेल की चुनौती…!

देहरादून। उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की गतिविधियां तेज होने लगी हैं। भाजपा ने संगठन को सक्रिय करने और बूथ स्तर तक चुनावी तैयारी मजबूत करने पर जोर दिया है, जबकि कांग्रेस के सामने वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल और एकजुटता बनाए रखने की चुनौती है। प्रदेश प्रभारी राम माधव के लगातार दौरों और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर उठे सवालों ने दोनों दलों की तैयारियों को चर्चा में ला दिया है।

भाजपा का संगठन पर जोर, राम माधव के लगातार दौरे

भाजपा ने आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच समन्वय बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। प्रदेश प्रभारी राम माधव के साथ सह-प्रभारियों की नियुक्ति भी इसी तैयारी का हिस्सा है। पार्टी की बैठकों में संगठन की विभिन्न इकाइयों को सक्रिय करने, बूथ मजबूत बनाने और सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।

भाजपा की रणनीति में कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क और सरकार के कामकाज को जनता के सामने रखने को अहम माना जा रहा है। हालांकि, सत्ता में रहते हुए जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना भी पार्टी के सामने चुनौती होगी।

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत के अनुसार, रोजगार, पलायन, भर्ती प्रक्रियाएं, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं और पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर विपक्ष सरकार को घेर सकता है। ऐसे में भाजपा को संगठन की सक्रियता के साथ अपने कामकाज का पक्ष भी जनता के सामने रखना होगा।

जय सिंह रावत का मानना है कि उत्तराखंड में पहाड़ और मैदान की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए चुनावी रणनीति बनाते समय क्षेत्रवार मुद्दों, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय और कार्यकर्ताओं की नाराजगी को दूर करने पर भी ध्यान देना होगा।

कांग्रेस के सामने एकजुटता बनाए रखने की चुनौती

दूसरी ओर कांग्रेस में हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा को लेकर पार्टी नेतृत्व की नाराजगी सामने आई। प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा ने यात्रा को लेकर आपत्ति जताई थी और सामूहिक कार्यक्रमों के माध्यम से चुनावी अभियान चलाने पर जोर दिया था। इसके बाद 9 अक्टूबर को दिल्ली में हरीश रावत और कुमारी सैलजा की मुलाकात हुई। इस घटनाक्रम ने चुनाव से पहले कांग्रेस के भीतर नेतृत्व और संगठन के तालमेल को लेकर चर्चा तेज कर दी।

जय सिंह रावत के मुताबिक, कांग्रेस के सामने केवल सरकार को घेरने वाले मुद्दे उठाने की चुनौती नहीं है, बल्कि उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि चुनावी अभियान की कमान किसके हाथ में होगी और वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय कैसे बनाया जाएगा। रोजगार, महंगाई, पलायन और भर्ती जैसे मुद्दे पार्टी के लिए अहम हो सकते हैं, लेकिन उन्हें जनता तक पहुंचाने के लिए निरंतर जनसंपर्क और मजबूत संगठन की जरूरत होगी।

उनका कहना है कि हरीश रावत का राजनीतिक अनुभव कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकता है, लेकिन उनकी गतिविधियों और संगठन की रणनीति के बीच तालमेल भी जरूरी है। पार्टी नेतृत्व के सामने विभिन्न नेताओं की सक्रियता को साझा चुनावी अभियान में बदलने की चुनौती है।

भाजपा और कांग्रेस के अपने-अपने तर्क

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का कहना है कि भाजपा पहले दिन से जनता के बीच रहकर काम करती है और उसे चुनाव के लिए अलग से सक्रिय होने की जरूरत नहीं पड़ती। उनके मुताबिक, प्रदेश प्रभारी और सह-प्रभारी भी क्षेत्रीय परिस्थितियों को समझते हुए तैयारी कर रहे हैं।

वहीं, कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष संजय पालीवाल ने भाजपा की चुनावी सक्रियता पर सवाल उठाए। उनका आरोप है कि चुनाव नजदीक आने पर भाजपा बड़े दावों और नारों के जरिए जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस रोजगार, महंगाई और जनता से जुड़े दूसरे मुद्दों को लेकर सरकार के खिलाफ आवाज उठा रही है।

दोनों दलों के इन बयानों से स्पष्ट है कि चुनाव से पहले राजनीतिक विमर्श में संगठनात्मक तैयारी के साथ-साथ सरकार के कामकाज और जनसमस्याओं को लेकर आरोप-प्रत्यारोप भी तेज होंगे।

बैठकों और दौरों से आगे असर दिखाना होगा

उत्तराखंड की राजनीति पर नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार किरण कुमार शर्मा का मानना है कि चुनावी तैयारियों का आकलन केवल नेताओं के दौरों और बैठकों की संख्या से नहीं किया जा सकता। महत्वपूर्ण यह है कि इन गतिविधियों का असर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच कितना दिखाई देता है।

उनके अनुसार, भाजपा के लगातार दौरे संगठन की कमजोरियों और क्षेत्रीय परिस्थितियों को समझने में मदद कर सकते हैं। वहीं कांग्रेस के लिए नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करने और स्थानीय मुद्दों पर लगातार अभियान चलाने की जरूरत होगी।

किरण कुमार शर्मा का कहना है कि उत्तराखंड के मतदाताओं के सामने स्थानीय समस्याओं के साथ व्यापक राजनीतिक मुद्दे भी होते हैं। इसलिए दोनों दलों को स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ जनता के बीच जाना होगा। उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय समीकरण और चुनाव के समय मतदाताओं का रुख भी परिणाम को प्रभावित करेंगे।

फिलहाल भाजपा संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने में जुटी है, जबकि कांग्रेस के सामने अपने मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाने के साथ संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती है। चुनाव से पहले दोनों दलों की रणनीतियों का वास्तविक असर कितना होगा, यह आने वाले महीनों में उनके जनसंपर्क, संगठन की सक्रियता और जनता से जुड़े मुद्दों पर उनके रुख से सामने आएगा।

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Author: nirbhiknazar

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